आधी हकीकत आधा फ़साना
बात आज से 25 साल पहले की है। दूरस्थ गांव में विधुत की समस्या से लोग तब जूझ रहे थे। विधुत आपूर्ति होती भी तो चंद घंटों के लिए होती थी ऊपर से रात्रि में कम वोल्टेज होने के कारण बस बिजली के बल्ब का केवल तन्तु ही जलता था। इस समस्या का निदान गाँव मे मिट्टी के तेल का लैम्प या ढ़िबरी (कांच की छोटी शीशी में मिट्टी तैल डाल कर, बोतल के ढक्कन में छेद कर के कपड़े एक सिरा बोतल के अन्दर और दूसरा शिरा ढक्कन से होते हुए बाहर) को जला कर करते थे। अच्छे अस्पताल और विद्यालय गाँव से दूर होने के कारण वहां जाने के लिए भी काफी मशक्कत करने पड़ते थे। कारणवश लड़के तो इन्टरमीडिट तक की शिक्षा ग्रहण कर लेते थे परन्तु जिन लड़कियों ने मैट्रिक तक की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली तो उन्हें बहुत शौभाग्यशाली मानी जाती थी और उनके रिश्ते अच्छे और बड़े परिवार में होता था। उन दिनों गांव में मनोरंजन के साधन का अभाव होता था। सूर्यास्त के बाद ही भोजन कर के जल्दी सो जाया करते थे। दूरस्थ गांव में यातायात की सुविधा रात्रि 7 बजे के बाद बिल्कुल बन्द हो जाती थी।
उस वक़्त संयुक्त परिवार का बोलबाला होता था। घर में जो सबसे बड़े होते थे वो ही घर के मुखिया होते थे और उनका ही वर्चस्व होता था। उनका निर्णय ही अन्तिम फैसला होता था। उनकी बातों का विरोध करने का न तो किसी मे साहस होता था न ही हिम्मत। उन दिनों यदि किसी का विवाह भी तय करना हो, तो लड़की को देखने घर के बड़े बुजुर्ग और वो ही पुरुष जाते थे जो विवाहित होते थे। घर की महिलाओं को और जिस पुरुष या महिला की शादी की बात चलती थी उनका जाना या आमने सामने मुलाकात करवाना समाज के खिलाफ माना जाता था। विवाह एक त्यौहार की तरह मनाया जाता था। विवाह का कार्यक्रम लगभग लगातर 10 दिनों तक तक चलता था। रिस्तेदार तब तक तक जमे रहते थे जब तक दूल्हा दुल्हन के ससुराल में ला कर पार्टी ना दे।
बहरहाल यह वाक्या 6 मई 1989 की है। मैं बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से अपनी स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। मेरे मामा जी बनारस कैन्ट रेल्वे स्टेशन के रेल्वे कॉलोनी के पीछे रहते थे। उनका वहाँ पुस्तैनी घर था। मैं उन्हीं के यहां रह कर अपनी पढ़ाई पूरी कर रहा था। मई के महीने में गर्मियों के कारण 20 दिन का अवकाश होता था। मैंने अपने गाँव जाने का निर्णय किया। मेरे गाँव का नाम पहरमा है जो कि बनारस से 150 किलोमीटर की दूरी पर था। ट्रैन से सासाराम तक जाना होता था। क्योंकि वहां से गांव जाने के लिए 25 किलोमीटर दूरी बस से यात्रा कर के जाना पड़ता था। 25 कि.मी. की दूरी तय करने में बस से लगभग 1:30 घंटे लग जाते थे। इतना वक़्त लगने की वजह वहां की जर्जर सड़क थी, जो कि वहां के स्थानीय दबंगई लोगों के कारण थी।
वहां पास के ही सोन नदी में दिन रात अवैध तरीके से खुदाई और ढुलाई के कारण सड़क की हालत नाजुक हो चली थी। मैंने बनारस से दून एक्सप्रेस पकड़ी जो कि शाम 4 बजे थी, परन्तु किसी कारणवश ट्रैन 1:30 घण्टे विलम्ब होने के कारण 5:30 बजे बनारस स्टेशन आई थी। मैं सासाराम 7:30 बजे रात को पहुंचा।
अब परेशानी का शबब ये था कि गांव के लिए अन्तिम बस 7:15 बजे निकलती थी। मैं 15 मिनट लेट पहुँचा था। मेरे दिमाग में उस व्यक्त अजीब दुविधा चल रही थी। एक तरफ मेरा दिमाग यह सोच रहा था कि शायद सवारी लेने के चक्कर से बस अभी ना खुली हो? दूसरी तरफ मेरा दिमाग यह कह रहा था कि आज रात यहीं वेटिंग रूम में इंतजार कर लूं। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में इतनी रात जाना सही नहीं होगा।
मन में अजीब सी बैचैनी हो रही थी। लेकिन मैंने सोचा कि यदि 2 घंटे में पहुँच जाऊंगा तो पूरी रात आराम करने को मिल जाएगा और अगले दिन सुस्ती नहीं छाएगी। मैं दौड़ कर बस स्टैंड की तरफ भागा, जो कि रेलवे स्टेशन के बिल्कुल सामने थी। उस वक़्त बस स्टैंड से ज्यादा रोड के किनारे ही गाड़ी खड़ी रहती थी। मेरे पास समान ज्यादा नहीं था, इसलिए रेल्वे प्लेटफॉर्म से बस स्टैंड जाने में मुश्किल से 3 से 4 मिनट ही लगे होंगे।
मैंने वहां पहुचकर आस पास के लोगों से पूछा तो पता लगा कि बस अभी 5 मिनट पहले ही निकल चुकी है। मैं बिल्कुल हताश सा था, तभी मुझे वहां 2 लोग मिले जो कि उसी ट्रैन से उतरे थे। उनसे बात करके पता लगा कि वो लोग बरडीहां तक जाएंगे जो कि मेरे गाँव पहरमा से मात्र 5 किलोमीटर पहले पड़ता था। उन्होंने एक ट्रेक्टर वाले से बात की थी जो उन्हीं के गांव का था और वो ईंट बजरी लेकर बरडीहाँ तक जाने वाला था। मैंने बात की तो वो लोग मुझे भी बरडीहाँ तक ले जाने को तैयार हो गए।
वहां से 5 कि.मी. की दूरी मैंने पैदल ही तय करने की सोची। मैं बहुत उत्साहित था क्योंकि बहुत दिनों बाद गांव जा रहा था। मेरे गांव के पड़ोसी गांव सिकरियाँ में हर गर्मी के वक़्त नाटक का पाठ बहुत ही मनमोहक होता था। आस पड़ोस के लोग रोज देखने आते थे। 12 रातों का यह कार्यक्रम होता था।
हम तीनों ट्रेक्टर पे बैठ गए और ट्रेक्टर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ गयी। आज मन में अजीब सी बेचैनी हो रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे कुछ होने वाला है। दिल और दिमाग पहली बार एक मत नहीं थे। एक तरफ जहां दिल इतनी रात गए घर जाने कि जगह स्टेशन पर रुकने के लिए कह रहा था तो वहीं दूसरी तरफ दिमाग किसी भी तरह आज रात को ही गाँव जाने कि बात पर जोर दे रहा था। मैंने सब आने वाले समय के साथ छोड़ दिया था लेकिन मुझे नहीं पता था कि आगे चलकर यही मेरी सबसे बड़ी भूल बन जाएगी।
सवा घण्टे में लगभग पौने नौ बजे के आस पास मैं बरडीहाँ चौक पर उतरा। मैने उन लोगों को विदा किया और धन्यवाद कर के मैं अपने गांव की तरफ बढ़ चला। तभी मेरे दिल मे ख्याल आया, “अरे! क्यों ना मैं उस ट्रेक्टर वाले को बोलूं की वह मुझे मेरे गाँव तक ही छोड़ दे, बदले में कुछ ज्यादा पैसे दे दूंगा।”
लेकिन जब तक मैं उसको बताता तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ट्रेक्टर वाला मेरी नजरों से ओझल हो चुका था। वो अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो चुका था। उसके इतनी जल्दी वहाँ से चले जाने पर मुझे ताज्जुब हुआ। मैंने देखा कि उस चौक पर मेरे सिवा कोई भी मौजूद नहीं था। अपने आप को वहाँ अकेला देखकर मेरे जिस्म में एक ठंडी लहर दौड़ गई।
मेरे दिल मे आज अजीब सी बैचैनी हो रही थी। कुत्तों के भौंकने की आवाज से मेरे कदम दर कदम बढ़ाने के साथ साथ और तेज होती जा रही थी। मैंने अपने डर को नियंत्रण करने के लिए लकड़ी को उठाया, जो कि सड़क के किनारे इतनी रात को बेजान सी पड़ी थी। अब मेरे अन्दर कुछ साहस आया कि मैं अब अकेला नहीं था। मुझे एक साथी मिल गया था जो मेरी हिम्मत बढ़ा रहा था। छड़ी ने वास्तव में मेरा आत्मविश्वास बढ़ा दिया था, जिसके फलस्वरूप मेरे कदम और तेज हो गए थे।
चाँदनी रात थी तो मुझे रास्ते से जाने में कोई तकलीफ भी महसूस नही हो रही थी। हवाओं की सरसराहट से पेड़ो पर पत्तियां रात में अजीब सी आवाजे पैदा कर रहीं थी। उन आवाजों से मन कहीं न कहीं ख़ौफ़ को उजगार कर रही थी। अकेले होने का सबसे अजीब तब लगता है जब मन मे बहुत सारे काल्पनिक ख्यालो को जन्म देने लगी है। मन मे अजीब अजीब से ख्याल आ रहे थे। हिम्मत होते हुए भी उस आवाज की तरफ देखने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। मैं इन छोटी मोटी घटनाओ को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ते जा रहा था, लेकिन मुझे क्या पता था कि सबसे बड़ी चूनौती तो मेरा रास्ते मे इंतजार कर रही थी। मैं लगभग 15 मिनट ही चला था कि अचानक से मौसम में परिवर्तन महसूस किया। हवाएं अब सर्द हो चुकीं थी। मुझे हल्की ठंड का एहसास हुआ।
सवा नौ हो चला है तो इस वक़्त गांव में ठंड लगती होगी। लेकिन मैं जैसे ही कुछ कदम चला था कि अचानक मैं अपना संतुलन खो बैठा औऱ सड़क के किनारे किसी खेत में जा गिरा। मैं बिल्कुल सहम सा गया कि ये अचनाक ऐसा कैसे हो सकता है। मेरी कुछ भी समझ नही आ रहा था। अचानक गिरने की वजह से मेरे दाईं टांग के घुटने पर चोट आई थी। तभी मैंने अपने दाईं हाथ के नीचे कुछ मुलायम सा महसूस किया। हाथ उठाकर मैंने सूंघा तो अजीब सी बदबू आई। ऐसी बदबू जैसे कि तुरन्त उल्टी कर दूं। मैंने अपने आप को संभालते हुए अपने बैग से टॉर्च निकाल कर देखा तो मैं जोर से चीख पड़ा।
चीख इतनी तेज थी कि जो आस पास के गांव में जो कुत्ते खामोश थे, वो भौं भौं कर के गुर्राने लगे। मैंने अपने वहम को दूर करने के लिए दुबारा वहां टॉर्च से प्रकाश कर के देखा तो हस्तप्रभ रह गया। मेरे हाथ बिल्कुल सुर्ख लाल था। मेरे पंजे में खून ही खून लगा हुआ था। तभी मेरी नजर वहां मरी हुई बिल्ली पड़ी जिसकी खोपड़ी ही नहीं थी। मेरे हाथ में खून लग गया था और वो खून उसी बिल्ली की थी। मेरा दिल अब जोरों से धड़कने लगा था। मेरे दिमाग ने मेरे दिल को एक संकेत दिया कि अब कुछ ऐसा होने वाला है जिसकी परिकल्पना मैंने किसी सपने में भी नहीं कि थी।
मेरे बदन में सुरसुरी सी दौड़ गयी। मैं बिल्कुल विचलित सा हो उठा कि आखिर इस हालात पर नियंत्रण कैसे किया जाए। मरी हुई बिल्ली तक तो ठीक था परन्तु उस बिल्ली कि सर उसके धड़ पर मौजूद ही नहीं थी। मैं सोचने लगा आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? फिर काफी देर तक तर्क वितर्क करने के बाद मैंने सोचा कि शायद कुत्ते या कोई जंगली जानवर उसका सिर खा गए होंगे। फिर मैंने पीछे टॉर्च से प्रकाश कर के सड़क पर देखा तो वहां एक गड्ढा था। जो पांव के नीचे अचानक आ जाने के कारण मैं संतुलन खो बैठा था। मैने अपने आपको दिलासा दिया कि इन सबकी वजह वो गड्ढा ही था, ना अचानक मेरा पैर पड़ता न ही मैं उस बिल्ली पर गिरता। लेकिन किसे पता था कि ये घटना तो आने वाली अनहोनी का सूचक था।
मैं इन सब बातों को भुलाकर आगे बढ़ने लगा। मुश्किल से कुछ दूर चला ही था कि मैंने खेत की तरफ से एक इन्सान को सड़क की तरफ आते देखा। मैं पूरी तरह विचलित हो उठा और मन ही मन बोला "भला इतनी रात को कोई खेत मे क्या कर सकता है। वो भी अकेले।" मेरे कदम अपने आप ही रुक गए और मैं चाह कर भी अपने कदम आगे नहीं बढ़ा पा रहा था। कुछ ही क्षण में वो इंसान मेरे बिल्कुल सामने था।
मेरे अंदर इतनी साहस नहीं थी कि मैं कुछ कह पाऊँ। तभी अचानक वो मुझे देख कर हँस पड़ा और बोला, “अरे नीतीश बाबू कैसे हो? इतनी रात कहाँ से आ रहे हो?”
मैंने टॉर्च उस व्यक्ति के मुख पर डाला तो जान में जान आई। वो व्यक्ति जिसने मेरी सिट्टी पिट्टी गुम कर दी थी वो सतीश भईया थे, जो हमारे ही गाँव के रहने वाले थे। सतीश भईया का घर हमारे घर के सामने ही था। मैंने उनको हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और बोला, "भइया वो ट्रैन विलम्ब हो गई थी तो जैसे तैसे कर के यहां तक पहुँचा हूँ। लेकिन आप इतनी रात को यहां क्या कर रहे हो?"
मेरी इस बात को सुनकर वो मुस्कुरा दिए और बोले, "अरे गर्मी का महीना है, आजकल नहर में पानी कम है। मैं अपने नहर से खेत मे पानी डालने के लिए उपाय करने गया था।"
"इतनी रात में" मैंने तपाक से कहा।
"अरे दिन में बहुत गर्मी होती है और नहर में पानी का स्तर कम होने की वजह से सभी के खेतों में जल आपूर्ति होना मुश्किल रहता है।" उन्होंने जवाब दिया।
मैं बोला, "चलिए सही हुआ कुछ दूर के लिए सफर का सहारा तो बनेंगे। लेकिन आपको नहीं लगता कि इस सुनसान रात में अकेले नहीं आना चाहिए, किसी को तो साथ....!"
"अरे काहे का डर। हम गांव के लोग किसी से नहीं डरते। हमे रोज की आदत है। छोड़ो ये सब और बताओ पढ़ाई कैसी चल रही है और गांव में कितने दिनों तक रहने वाले हो इस बार?" मेरी बातों को बीच मे ही काटकर वो बोल पड़े थे।
"20 दिन तक तो एकदम फ्री हूँ, लेकिन इन छुट्टियों में कहीं नही जाने वाला, इस वर्ष भी नाटक का आनंद लेना है।" मैंने उन्हें जवाब दिया।
सतीश भइया बोले, “हाँ हाँ क्यों नहीं तुम्हारा गांव है जो करना है करो, भला तुम्हे कौन मना कर सकता है।”
उनकी बात सुनकर मैं बोला, “अब तो निशि स्कूल भी जाने लगी होगा क्यों भईया?”
मेरी बात सुनकर वो थोड़े मायूस से दिखे मानो जैसे किसी गहरी सोच में डूब गए हों। उन्हें इस तरह ख्यालों में डूब देख मैंने दुबारा बात करने की कोशिश करते हुए कहा, “क्या हुआ भईया? मेरी गुड़ियारानी निशि ठीक तो हैं ना?”
वो गंभीर मुद्रा में बोले, “अरे तुम उसके पापा नहीं हो लेकिन चाचा तो हो। अभी तो निशि चार साल की ही हुई है लेकिन वह हमेशा पूछती रहती है कि सतीश चाचा कब आएंगे? जब तक तुम हो उसको भला क्या होने वाला? अब आ ही गये हो तो उसका भी ख्याल अच्छे से रखना।” ये कहते ही वो हंस पड़े और मैं भी उस हंसी में शामिल हो गया था।
आज सतीश भईया की बातें कुछ अजीब सी लग रहीं थी जैसे वह मुझसे कुछ छिपाने की कोशिश कर रहे हों। मैंने सोचा क्या पता उन्हे कुछ निजी परेशानी हो इसलिए मैंने उन्हें टोकना मुनासिब नहीं समझा। बातों बातों में सफर का पता ही नही लगा।
“भईया देखिये हमलोग कितने जल्दी घर भी आ गए।" मैंने यह कहकर अपने घर का मुख्य दरवाजे को खटखटाया। दरवाजे को खटखटाने के बाद मैंने जैसे पीछे पलटकर देखा तो सतीश भईया वहाँ नहीं थे। मुझे लगा कि मुझे घर तक सुरक्षित पहुंचाने के बाद सतीश भईया भी अपने घर की तरफ चले गए होंगे।
रात्रि के 10:30 बज रहे थे। इस वक़्त पूरा गांव गहन निद्रा में होता है। थोड़ी देर में मेरे बड़े दादा जी ने दरवाजा खोला और मैंने आगे बढ़ कर उनके चरण स्पर्श किए। दादा जी बोले, "बहुत देर हो गए तुम्हे आते आते। कोई तकलीफ तो नहीं हुई रास्ते मे?"
मैने फिर वही ट्रैन विलम्ब से आने वाली बात उन्हें बताई और अपना सामान ले कर घर के अंदर जाने लगा तभी वो बोले, "तुम अभी बाहर किस से बातें कर रहे थे?
"अरे वो...वो सतीश भईया थे। वो मुझे रास्ते में मिले थे। मुझे यहाँ छोड़ने के बाद घर चले गए।"
मेरे यह बोलते ही पता नहीं दादा जी मुझे इतने गौर से क्यों देखने लगे और मुख्य दरवाजे को बंद करते हुए बुलंद आवाज में बोले, “प... पागल हो क्या?”
मुझे उनका इस तरह से कहना अजीब लगा मैंने उसने कहा, “क्या हुआ दादा जी?”
वो सख्त आवाज में बोले, "जाओ जाओ अपना सामान ले कर अंदर जाओ।"
मुझे उनका यह बर्ताव अजीब लग रहा था। इस से पहले उन्होंने मुझसे इस तरह कभी कुछ कहना तो दूर डांटा भी नहीं था। मेरा मन आशंकित हो चला था। मेरे दिमाग में तरह-तरह के खयाल पनपने लगे थे। मैं एक बार फिर से उलझ गया था जिसका जवाब मुझे खुद तलाशना था।
मुझे पहले लगा कि वो मेरे इतने विलम्ब में आने से खफा हैं लेकिन अगले पल ही समझ आ गया कि इसके पीछे की वजह क्या है? सतीश भईया पड़ोसी तो थे लेकिन उनके पापा और मेरे दादा जी में आपस मे नही बनती थी। इसके पीछे की वजह थी शराब। सतीश के पापा हमेशा नशे में धुत रहते थे। मैं मुस्कुरा कर घर के अंदर चला गया।
चिड़ियों की मधुर आवाज मेरे कानों में पड़ रही थी। सूरज की किरण खिड़की से होते हुए मेरे चहरे पर आ रही थी। खिड़की से होते हुए हवाएं कमरे के अंदर आ रही थी जो अपने साथ गाँव की मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू मुझ तक ला रही थी। मैं मन ही मन बोल पड़ा "वाह यही तो खासियत है गांव की। भला कोई अपने गांव की मिट्टी से कब तक दूर रह सकता है। मैंने उठ कर जैसे ही अंगड़ाई ली वैसे ही मुझे एक सुगंधित खुसबू का एहसास हुआ, जो कि बालों में लगाने वाले गजरे की थी। अगले ही पल इस राज से भी पर्दा उठा गया। भाभी ट्रे में चाय ले कर दाखिल हुईं थी। उन्होंने मेरा अभिवादन स्वीकार्य किया और कहा, "लगता है आपको आने में बहुत विलम्ब हो गया था।"
"आप जो आई हैं नहीं स्टेशन लेने तो ट्रैन ने भी लेट कर दिया।"
मेरे यह कहते ही दोनो हंस पड़े। फिर भाभी बोलीं, "बाते बनाना तो कोई आप से सीखे। चलिए जल्दी चाय पी कर हाथ मुंह धो लीजिए नास्ता भी बन कर तैयार है।" मैंने मुस्कुरा कर सिर हिला कर हामी भर दी, और वो चाय सामने मेज ओर रख कर बाहर चली गईं। थोड़ी देर मैं मैंने भी अपनी चाय खत्म की और बाहर आ गया।
घर में सभी सदस्यों से मिलने के बाद में दैनिक जीवन के आवश्यक कार्यों को निपटाने लगा। मैंने अपने बैग से तौलिया, चड्डी और बनियान निकाले और सतीश भईया के घर की तरफ चल पड़ा। हमारे गांव के दूसरे छोर पर ही नहर है। मैं जब भी गांव आता था तो हमेशा नहर में ही नहाने जाता था। सतीश भईया ने ही मुझे उस नहर में तैरना सिखाया था। मैं मन मे प्रसन्नता के भाव लिए जा रहा था।
जैसे ही सतीश भईया के घर के दरवाजे के निकट पहुँचा वहाँ भाभी मिल गयी। मैंने उनको भी प्रणाम किया और बोला, “किधर हैं सतीश भईया? अभी उठे नहीं क्या?"
जो भाभी अभी अभी मुझे देखकर मुस्कुरा रहीं थी वो एकदम से चुप हो गईं। मैंने कहा, "कल रात वो भी देर से घर आए थे और वो इसी वजह से अभी तक नहीं उठे होंगे, बोलो ना भाभी, मैं सच कह रहा हूँ ना? अच्छा चलो मैं खुद उनको उठता हूँ।" यह कहकर मैं उनके कमरे की तरफ बढ़ चला। जैसे ही मैंने उनके कमरे के दरवाजे को खोल कर पर्दे को हटाकर अंदर घूंसा, मेरी चीख निकल गयी। मैंने अपने कपड़े वहीं पटके और वहां से भाग चला। उस वक़्त अपनी इस हालात को बयां करने बहुत मुश्किल हो रहा था। मैं आंखों में आंशू लिए घर मे दौड़ते दौड़ते अपने रूम में चल गया और अंदर से छिटकनी लगा दी।
मैं कमरे के अंदर बेतहाशा रो रहा था। मेरे अचनाक इस तरह के बर्ताव से सभी घर मे चकित थे। मेरा बड़ा भाई हरीश ने दरवाजे को जोर जोर से थप थपाया और बोला, "क्या हुआ नीतीश। अचानक ऐसा क्या हो गया जो तुम रोने लगे?" सभी ने दरवाजे पर भीड़ लग दी थी। मैं अंदर से बिल्कुल सहम सा गया था। मेरी समझ मे कुछ भी नही आ रहा था कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने थोड़ी देर में अपनी भावनाओं पर नियंत्रण किया औऱ दरवाजे को खोल दिया। मेरे दरवाजे खोलते ही सभी एक साथ अंदर आ गए। सभी एक साथ बोलने लगे, “अरे बताओगे भी क्या हुआ? ऐसा क्या हुआ जो तुम रोने लगे गए?”
मैंने सिसकते हुए कहा, "वो...वो सतीश भईया के घर गया था, मैंने जैसे ही उनके कमरे का दरवाजा खोला तो......!"
ये कहकर मैं और ज्यादा बिलख बिलख कर रोने लगा। सभी मेरे इस व्यवहार को देख कर चकित थे।
तभी मेरे पिता जी ने जोर से कहा, "अरे बताओ भी क्या देखा तुमने वहां?"
मैं बोला- "मैंने देखा कि सतीश भईया की एक बड़ी फ़ोटो थी जिसमे हार चढ़ाया हुआ था और उनके तस्वीर के पास धूप और अगरबत्तियां जल रही थी। ये कब और कैसे हुआ? आप लोगों ने मुझे बताया क्यो नहीं?"
मेरा बड़ा भाई हरीश बोला, "यह बात 7 दिन पहले की ही है और तब तुम्हारी स्नातक में द्वितीय वर्ष की परीक्षा चल रही थी।"
"तो आप लोगों ने बताया क्यों नहीं?" यह कहकर मैं और रूँवाशा हो गया। इस बार आवाज मेरे पिता जी की थी, "बेटा जो होना था वो तो हो चुका, हम नहीं चाहते थे कि परीक्षा के वक्त तुम्हे यह खबर बता कर तुम्हे विचलित करें।"
तभी मैं जोर से बोला, "नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। कल ही तो मैं उनसे मिला और उन्होंने ही तो मुझे कल रात घर तक छोड़ा।"
"ये सुबह सुबह क्या बहकी बहकी बातें कर रहे हो। होश में तो हो तुम?" इस बार मेरी माता जी ने कहा था।
"मेरा विश्वास करो माँ मुझे वो कल रात गांव से कुछ दूर पहले मिले थे। वो नहर से पानी का रास्ता खेत मे बनाने गए थे। मैं उनसे बाते करते करते ही यहां घर तक आया। वो मुझे घर तक छोड़ कर अपने घर की तरफ निकल गए थे।"
मेरी इस बातों से सभी आश्चर्य चकित थे कि भला ऐसा कैसे हो सकता है। किसी को मेरी बातों और विश्वास नहीं हो रहा था। किसी को यह भी लग रहा था कि इतना गंदा मजाक तो ये कर नहीं सकता। लेकिन उन्होंने ये बात भी मानी की ये बच्चा तो है नहीं हो सकता है कहीं न कहीं उसकी बातों में सच्चाई हो। भला सतीश ने कोई नुकसान भी नहीं पहुंचाया, क्योकिं वह इसे छोटे भाई की तरह मानता था।
तभी मेरे दादा जी ने कहा- "हम्म हो सकता है कि यह सही कह रहा हो क्योकिं मैं कल रात बाहर आंगन में खाट पर सोया था। जब यह आया तो मैंने दो लोगों की आवाज सुनी तो थी, लेकिन यह कहना मुश्किल होगा कि वो दूसरा बन्दा सतीश ही था। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं निकलता की हम इसकी बातों को पूरी तरह से नकार दें।" उनके इस बात ने सबको स्तब्ध कर दिया था।
दादा जी की इन बातों से अब सबको काफी हद तक प्रमाण भी मिल गया था कि मैंने कल सतीश भईया की आत्मा से मुलाकात की है। अभी के सब बातें चल ही रही थी कि मेरी माँ बोल पड़ी, "ह्म्म्म अभी सतीश को गुजरे मात्र 7 दिन हो रहे हैं। क्या पता उसकी आत्मा अभी भटक रही हो, जब तक तेरहवीं नहीं हो जाती तब तक अपने किसी न किसी करीबी को जरूर दिखेगा।"
अब तक सभी जो खामोश हो कर खड़े थे, अब उनके अंदर डर का भाव घर चुका था। यदि परिवार का कोई भी सदस्य ज़िंदा रहे तो वह अत्यन्त प्रिय होता है लेकिन उसके मौत के बाद कोई भी व्यक्ति नहीं चाहता कि उसके दर्शन आत्मा के रूप में हों। मेरा तो दिमाग सुन्न पड़ गया था कि मैं सतीश भईया के इस दुनिया से जाने का दुख मनाऊँ या उनसे कल मुलाकात हुई उस बात से खुद को तसल्ली दूँ। आज भी मैं जब उस घटना को याद करता हूँ कि क्या सच मे कोई मरने के बाद भी मिल सकता है तो एकदम सिहर सा जाता हूँ।
समाप्त

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें